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नमो नमो दुर्गे सुख करनी
Durga Mata

नमो नमो दुर्गे सुख करनी

नमो नमो दुर्गे सुख करनी

बोल

1

श्री दुर्गा चालीसा

॥चौपाई॥

नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो अंबे दुःख हरनी ॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी । तिहू लोक फैली उजियारी ॥

शशि ललाट मुख महाविशाला । नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥

रूप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ॥

तुम संसार शक्ति लय कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥

अन्नपूर्णा हुयि जग पाला । तुम ही आदि सुंदरी बाला ॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी । तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावेम् । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावेम् ॥

रूप सरस्वती का तुम धारा । दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥

धरा रूप नरसिंह को अंबा । परगट भयि फाड के खंबा ॥

रक्षा कर प्रह्लाद बचायो । हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीम् । श्री नारायण अंग समाहीम् ॥

क्षीरसिंधु में करत विलासा । दयासिंधु दीजै मन आसा ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ॥

मातंगी धूमावति माता । भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥

केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

कर में खप्पर खडग विराजे । जाको देख काल डर भाजे ॥

तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥

नगरकोटि में तुम्हीं विराजत । तिहुँ लोक में डंका बाजत ॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥

रूप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥

पडी भीढ संतन पर जब जब । भयि सहाय मातु तुम तब तब ॥

अमरपुरी अरु बासव लोका । तब महिमा सब कहें अशोका ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावेम् । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवेम् ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लायि । जन्म मरण ते सौं छुट जायि ॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न होयि बिन शक्ति तुम्हारी ॥

शंकर आचारज तप कीनो । काम अरु क्रोध जीत सब लीनो ॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥

शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गयी तब मन पछतायो ॥

शरणागत हुयि कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदंब भवानी ॥

भयि प्रसन्न आदि जगदंबा । दयि शक्ति नहिं कीन विलंबा ॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥

आशा तृष्णा निपट सतावेम् । रिपु मूरख मॊहि अति दर पावैम् ॥

शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥