सावन 2026: कब से कब तक रहेगा श्रावण मास? जानें संपूर्ण कैलेंडर, सावन सोमवार तिथियां और पूजा विधि
सनातन धर्म में श्रावण मास (सावन) का समय सबसे पवित्र और फलदायी माना जाता है। यह पूरा महीना देवों के देव महादेव भगवान शिव और माता पार्वती की साधना, पूजा-अर्चना, जलाभिषेक और उपवास के लिए समर्पित होता है। सावन आते ही चारों ओर "हर-हर महादेव" और "बम-बम भोले" के जयकारे गूंजने लगते हैं।
हर साल श्रद्धालुओं के मन में यह उत्सुकता होती है कि "सावन कब से शुरू हो रहा है और कब तक रहेगा?"
आइए जानते हैं कि वर्ष 2026 में सावन की सटीक शुरुआत और समाप्ति तिथियां क्या हैं, सावन सोमवार की सूची, इसका पौराणिक व वैज्ञानिक महत्व, और शिव पूजा की सरल एवं प्रामाणिक विधि।
सावन 2026 कब से कब तक रहेगा?
वर्ष 2026 में, उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार श्रावण (सावन) मास की शुरुआत 29 जुलाई 2026 (बुधवार) से होगी और इसका समापन 27 अगस्त 2026 (गुरुवार) को श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के दिन होगा।
वहीं, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में प्रचलित अमांत पंचांग के अनुसार, सावन मास 15 दिन बाद यानी 13 अगस्त 2026 से शुरू होकर 11 सितंबर 2026 तक रहेगा।
श्रावण मास का इतिहास
श्रावण मास का नाम पंचांग के श्रवण नक्षत्र पर आधारित है। पूर्णिमा तिथि के दिन चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में विराजमान रहता है, इसलिए इस महीने को 'श्रावण' कहा जाता है।
प्राचीन समय में ऋषियों-मुनियों के लिए यह समय चातुर्मास की शुरुआत का होता था। वर्षा ऋतु के कारण यात्राएं स्थगित करके एक स्थान पर बैठकर शास्त्रों का अध्ययन और 'श्रवण' (सुनना) किया जाता था, जिससे इसका नाम श्रावण पड़ा।
पौराणिक कथा: समुद्र मंथन और नीलकंठ महादेव
सावन महीने का भगवान शिव से गहरा संबंध समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ा है।
कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया, तो उससे सबसे पहले अत्यंत भयानक हलाहल विष प्रकट हुआ। उस विष की तीव्र ज्वाला से पूरी सृष्टि जलने लगी।
[ देवताओं और दानवों द्वारा समुद्र मंथन ]
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[ भयानक 'हलाहल विष' का प्राकट्य ]
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[ सृष्टि पर विनाश का संकट ]
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[ भगवान शिव ने किया हलाहल विष का पान ]
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[ गले में रोका विष ➔ कहलाए "नीलकंठ" ]
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[ विष की जलन शांत करने के लिए देवताओं ने किया जल व दूध अर्पण ]
सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को स्वयं पी लिया और अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, जिससे वे नीलकंठ कहलाए।
विष की भयंकर गर्मी को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने भगवान शिव पर शीतल गंगाजल और दूध की धारा चढ़ाई। इसी स्मृति में आज भी सावन के पूरे महीने में शिवजी का जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक किया जाता है।
सनातन धर्म में महत्व
शास्त्रों में श्रावण मास को भक्ति और मोक्ष का द्वार बताया गया है।
"श्रावणे पूजितो देवो महादेवो महेश्वरः। सर्वान् कामान् अवाप्नोति शिवलोके महीयते॥"
(अर्थात: जो मनुष्य सावन मास में महादेव की पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और वह अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है।)
मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव माता पार्वती के साथ पृथ्वी लोक पर निवास करते हैं और अपने भक्तों की पुकार तुरंत सुनते हैं।
आध्यात्मिक महत्व
आत्मा की शुद्धि: सावन का महीना मन के विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) को शांत करने और ध्यान लगाने का सर्वोत्तम समय है।
माता पार्वती का तप: मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए सावन में ही कठोर तपस्या की थी। इसलिए कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए सावन सोमवार का व्रत रखती हैं।
वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
सावन मास केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है:
पाचन तंत्र को आराम (मंदाग्नि): वर्षा ऋतु में सूरज की किरणें कम मिलने और हवा में नमी बढ़ने से शरीर की पाचन शक्ति धीमी हो जाती है। व्रत रखने से पेट को विश्राम मिलता है और पाचन तंत्र ठीक रहता है।
संक्रमण से बचाव: मानसून में पानी और भोजन में सूक्ष्म जीवाणु जल्दी पनपते हैं। सात्विक और हल्का भोजन करने से बीमारियां दूर रहती हैं।
हरी पत्तेदार सब्जियां न खाने का कारण: वर्षा ऋतु में हरी पत्तेदार सब्जियों (पालक, पत्तागोभी) में कीड़े लग जाते हैं और शरीर में 'वात' दोष बढ़ता है। इसीलिए आयुर्वेद में सावन में साग खाने से मना किया जाता है।
पूजा विधि एवं अनुष्ठान (सावन शिव पूजा)
सावन में भगवान शिव की पूजा इस प्रकार करें:
प्रातः स्नान: सावन में प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (सफेद या हरे) धारण करें।
संकल्प: पूजा स्थल के सामने बैठकर हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजा का संकल्प लें।
जलाभिषेक:
शिवलिंग पर शुद्ध गंगाजल या जल चढ़ाएं।
फिर कच्चे दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से निर्मित पंचामृत अर्पित करें।
अंत में पुनः गंगाजल से स्नान कराएं।
सामग्री अर्पण: शिवलिंग पर चंदन का तिलक लगाएं। इसके बाद त्रिदल बेलपत्र, धतूरा, भांग, आंकड़े के फूल और अक्षत अर्पित करें।
मंत्र जप व आरती: 'ॐ नमः शिवाय' या 'महामृत्युंजय मंत्र' का १०८ बार जाप करें। अंत में शिव आरती करके प्रसाद वितरित करें।
सावन व्रत के लाभ
पापों का नाश: सच्चे मन से की गई शिव पूजा से जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं।
मानसिक शांति: चित्त की एकाग्रता बढ़ती है और तनाव से मुक्ति मिलती है।
वैवाहिक सुख: दांपत्य जीवन के क्लेश समाप्त होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है।
रोचक तथ्य
कांवड़ यात्रा: सावन में लाखों कांवड़िए गंगाजी से पवित्र जल भरकर नंगे पैर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हैं और शिवजी का अभिषेक करते हैं।
हरा रंग और प्रकृति: सावन में हरियाली छा जाती है, इसलिए इस महीने में हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियां पहनना प्रकृति के साथ एकाकार होने का प्रतीक है।
